
आपका बंटी by mannu bhandari - Aapka banti book review summary
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| आपका बंटी by mannu bhandari - Aapka banti book review summary |
आपका बंटी by mannu bhandari - Aapka banti book review summary in हिंदी 2022 :-
52 साल पहले लिखा गया उपन्यास पढ़कर लगा जैसे बस दो दिन पहले ही लिखा गया हो जबकि हकीकत ये कि 15 नवम्बर को मन्नू भंडारी जी को दुनिया से गये हुए एक साल हो जायेंगे। पर एक सच्चाई यह भी है ऐसे उपन्यास लिखने वाले या वाली अपनी रचनाओं के द्वारा हमारे बीच उपस्थित भी रहते हैं, इस हद तक कि पाठक की आँखें नम भी कर देते हैं।
"आपका बंटी" उपन्यास में 16 भाग हैं और हर भाग में कई-कई खण्ड। भागों के नाम नहीं हैं, आमतौर पर होते भी नहीं उपन्यासों में। पहला भाग पढ़कर न जाने क्यों कांता भारती के उपन्यास "रेत की मछली" की याद आ गयी, शायद नामों की समानता के कारण ..... उसमें कुंतल नाम था, इसमें शकुन ..... या शायद कुछ हद तक कहानी की समानता के कारण या शायद दोनों ही बातें हों।
पहला भाग शैली के हिसाब से अन्य उपन्यासों जैसा ही ठीक-ठाक सा लगा। पर दूसरे भाग से मन्नू भंडारी की शैली असली और अलग हो गयी जैसे मीटर गेज रेल-ट्रैक की बजाय पहाड़ी नैरो गेज की छोटी पटरी, जैसे ट्वाय ट्रेन की धीमी छुक-छुक रफ्तार। छोटे-छोटे और सधे वाक्य। लेखनी जैसे बाल-मन का कैमरा हो गयी, मानो कैमरे का मुँह बाहर की ओर नहीं भीतर की तरफ हो, जो मन के भीतर चल रही हलचल को अच्छे सा पकड़ता हो।
उपन्यास में कहानी का जटिल ताना-बाना, रहस्य, थ्रिल जैसा कुछ नहीं है। सरल, सपाट, सीधी उदास सी कहानी। कहानी प्रमुख है ही नहीं, प्रमुख है बाल-मन मंथन, संवेदना, भावों के उतार-चढ़ाव का आवेग, घुटन-कुढ़न, टूटन-जुड़न, शाम के धुँधलके जैसी अस्पष्ट समझ।
हर व्यक्ति मानो एक कैमरा होता है।
एक ही कमरे में अलग-अलग स्थान पर लगे कैमरे का चित्र अलग-अलग तरह से नजर आता है, सबको अपने-अपने तरीके से नज़र आता है। लगता है सब अपने-अपने नज़रिये से सही हैं। आखिर शीशा और कैमरा झूठ तो नहीं बोलते, हाँ, कैमरे की जगह ग़लत हो सकती है या जैसे बच्चे का मोबाइल कैमरा हो और बड़ों का डीएसएलआर कैमरा हो तो अन्तर तो होगा ही।
5-7 साल के बच्चे के लिए मम्मी ही पूरी दुनिया होती है और तब तो और भी, जब मम्मी पापा से अलग रह रही हो। पर मम्मी की अलग ही दुनिया हो गयी है दूसरा विवाह करके। यद्यपि मम्मी की दुनिया में बंटी भी है पर मम्मी की उस दुनिया में दूसरे पति के लिए के लिए ज्यादा जगह है, ज्यादा महत्व है। फिर मम्मी ने अपनी दुनिया में बंटी के अलावा दूसरे पति के बच्चों के लिए भी जगह बना ली है। बंटी अपने लिए मम्मी के प्यार का घटता-सिमटता दायरा और दूसरे पति के लिए ज्यादा बढ़ता दायरा, ज्यादा महत्व, ज्यादा प्यार बर्दाश्त से बाहर होता जाता है। भला अपने हिस्से का प्यार बँटता हुआ कौन बर्दाश्त कर सकता है, फिर बटी ही कैसे कर ले? बंटी पल-पल अपने में ही सिमटता-घुटता जा रहा है।
मम्मी है कि बंटी की मनोदशा समझते हुए भी नहीं समझना चाहती। मम्मी चाहती है कि बंटी समझदार बने, सबसे मिलकर रहे। जो वो कर रही है, उसे सही माने, स्वीकारे, समझौता करे। बंटी अपनी पहले वाली ही मम्मी चाहता है, केवल और केवल उससे ही प्यार करने वाली, उसकी ही परवाह करने वाली, उसके ही आगे-पीछे रहने वाली मम्मी। मम्मी अपने ही तरीके से ज़िन्दगी जीना चाहती है। बंटी न तो कह पाता है, न सह पाता है और न ही रह पाता है।
❤️ मन्नू भंडारी स्वयं भूमिका में लिखती हैं ---
🖤 पृष्ठ [viii] से
"मुझे लगा कि बंटी किन्हीं दो-एक घरों में नहीं, आज के अनेक परिवारों में साॅंस ले रहा है ----- अलग-अलग संदर्भों में, अलग-अलग स्थितियों में। लेकिन एक बात मुझे इन बच्चों में समान लगी और वह यह कि ये सभी फ़ालतू, ग़ैर-ज़रूरी और अपनी जड़ों से कटे हुए हैं।"
🖤 पृष्ठ [x] से
"शायद यही कारण है कि मैं इस त्रिकोण की किसी एक भुजा को न अस्वीकार कर सकी, न ही ग़लत सिद्ध कर सकी। पात्र अपनी-अपनी दृष्टि, संवेदना की सीमाओं में एक-दूसरे को ग़लत-सही कहते रह सकते हैं, लेकिन देखना यह ज़रूरी होता है कि लेखकीय समझ किसी के प्रति पक्षपात तो नहीं कर रही ? ग़लत और सही अगर कोई हो सकते हैं तो वे अजय,शकुन और बंटी के आपसी संबंध। इस पूरी स्थिति की सबसे बड़ी विडंबना ही यह है कि इन संबंधों के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार और सब ओर से बेगुनाह बंटी ही इस ट्रैजडी के त्रास को सबसे अधिक भोगता है।"
💚 इस उपन्यास से कुछ विशेष अंश ----
🌺 पृष्ठ 60 से
ममी शायद मुझसे नाराज़ हैं तो डाॅंट क्यों नहीं लेतीं? मैं क्या मना करता हूॅं? पर कुछ तो बोलें।
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🌺 पृष्ठ 61 से
एकाएक बंटी का मन रोने को हो आया। वह उठा। देखता हूॅं, कैसे नहीं बोलेंगी। मैं क्या कर सकता था, पापा ने जो बुलाया था।
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🌺 पृष्ठ 64 से
लो, अब ये फूफी भी रोकर आई है। अच्छा है, सब लोगों, खूब रोओ। पर उसे कुछ मत बताना। वह होता ही कौन है किसी का?
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🌺 पृष्ठ 65 से
ज़मीन पर नज़रें टिकाए-टिकाए ही उसने जान लिया कि ममी चलकर उसके पास आ रही हैं। क्षणांश को वह सकपका गया। कहीं आते ही एक चाॅंटा न जड़ दें। ठीक है, खा लेगा वह चाॅंटा भी, मारें तो सही। अब यहाॅं कुछ भी हो सकता है।
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🌺 पृष्ठ 109 से
शकुन को ख़ुद कभी-कभी आश्चर्य होता है कि उम्र के छत्तीस वर्ष पार करने पर भी उसके मन में इन सब बातों के लिए किशोर उम्र वाला उल्लास भी है और यौवन वाली उमंग भी। डॉक्टर का साथ होते ही कैसे एकांत की इच्छा हो उठती है और एकांत होते ही ...
लगता है, उम्र बीत जाने से कैशोर्य और यौवन नहीं जाता। ये भावनाऍं तो केवल तृप्त होकर ही मरती हैं, वरना और अधिक बलवती होकर आदमी को मारती रहती हैं।
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🌺 पृष्ठ 112 से
"बहू जी, मत चढ़ाओ इतना सिर! आख़िर औलाद तो उसी बाप की है! वे खड़े-खड़े थालियाॅं फेंकते थे और ये कटोरी ... "
कभी-कभी आश्चर्य होता है कि कैसे एक आदमी एक छोटे-से अणु में अपना चेहरा, मोहरा, आदत, स्वभाव, संस्कार ----- सब कुछ अपने बच्चे में सरका देता है।
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🌺 पृष्ठ 120 से
"जवानी यों ही अंधी होती है बहूजी, फिर बुढ़ापे में उठी हुई जवानी। महासत्यानाशी! साहब ने जो किया तो आपकी मट्टी-पलीद हुई और अब आप जो कर रही हैं, इस बच्चे की मट्टी-पलीद होगी। चेहरा देखा है बच्चे का ? कैसा निकल आया है, जैसे रात-दिन घुलता रहता हो भीतर ही भीतर।"
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🌺 पृष्ठ 122 से
हम कुछ नहीं लेंगे। भगवान के दरबार में जा रहे हैं, रुपया-पइसा का होगा क्या? देना ही है तो एक वचन दे दो कि हमारे बंटी भय्या को जैसा आपने बिसरा दिया है आजकल, वैसा और मत करना। बाप के रहते यह बिना बाप का हो रहा, अब माॅं के रहते यह बिना माॅं का न हो जाए ... " और फूफी ने साड़ी में मुॅंह छिपा लिया।
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🌺 पृष्ठ 124 से
पर आज तो अब जाना ही है।
बंटी स्कूल से लौट आया। ममी ने बचा-खुचा सामान भी उस घर में भिजवा दिया। बिना बरतनों की रसोई, बिना कपड़ों की अलमारियाॅं, बिना किताबों और मेज़पोश की भेजें, बिना दरी-कारपेट के फ़र्श ...
खिलौनों की खाली अलमारी देखकर एक क्षण को सारे खिलौने ऑंखों के सामने घूम गए ... पापा के भेजे हुए खिलौने।
एकाएक ख़याल आया ---- पापा तो इस घर का ही पता जानते हैं। अब वे आऍंगे तो ख़बर कहाॅं भेजेंगे ? उन्हें पता कैसे लगेगा ? कितने दिनों से पापा ने न कोई चीज़ भेजी न ख़बर। पापा को पता है कि ममी ने शादी कर ली है? हम लोग अब ने घर में रहेंगे? इस बार पापा को गए कितने दिन हो गए एक ... दो ... तीन ... छ: ... सात ... आठ महीने हो गए।
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🌺 पृष्ठ 130 से
ममी कैसे घूर-घूरकर देख रही हैं, देखें, वह क्या डरता है? बत्रा है तो बत्रा ही रहेगा और बत्रा ही रहेगा। ममी की तरह नहीं कि झट से जोशी बन गए।
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🌺 पृष्ठ 134 से
"क्यों पागलपन कर रहा है बेटे ? देख, ये दोनों भी तो हैं ? मुझे तंग करने में, सबके बीच शर्मिंदा करने में तुझे ख़ास ही सुख मिलने लगा है आजकल।"
हाॅं, मिलता है सुख ... ज़रूर करूॅंगा शर्मिंदा। तुम नहीं कर रही हो मुझे शर्मिंदा ? यहाॅं दूसरों के घर लाकर पटक दिया। 'अपना घर होगा', कोई नहीं है अपना घर ? मैं नहीं रहता किसी के घर ... पहले तो कमरा पसंद करो और फिर ....
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🌺 पृष्ठ 146 से
"एक बात कहूॅं बेटे, मानेगा ?"
अब बंटी की ऑंखें ममी के चेहरे पर टिक गईं।
"तू डाॅक्टर साहब को पापा क्यों नहीं कहता। ?"
बंटी चुप। ऑंखों के आगे कहीं अपने पापा की तसवीर तैर गई।
"बोल, कहेगा न अब से। ?"
"नहीं! "
"क्यों ?"
"मेरे पापा तो कलकत्ते में हैं ।"
ममी एक क्षण चुप। चेहरा कहीं हलके से सख़्त हो आया।
"ठीक है, हैं। पर जोत और अमि भी तो मुझे ममी कहते हैं।"
"उनकी ममी मर गई हैं इसलिए कहते हैं, मैं क्यों कहूॅं ?"
ममी उसे देखती रहीं और वह भी ममी को देखता रहा। एकटक, बिना नज़र हटाए, बिना झिझके।
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🌺 पृष्ठ 188 से
"शकुन !" डॉक्टर का स्वर छत के सन्नाटे में यहाॅं से वहाॅं तक फैल गया।
"तुम यहाॅं हो और नीचे किसी को पता तक नहीं। अरे, यह क्या, तुम रो रही हो ? शकुन !" और दो सबल बाॅंहें उसके चारों ओर घिर आईं और धीरे-धीरे पूरी की पूरी शकुन उनमें अपने-आप ही बॅंधती चली गई, सिमटती चली गई।
बस, दो नन्ही-नन्ही बाॅंहें उन सबल बाॅंहों के नीचे अनदेखे अनजाने ही शायद मसल गईं।
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पूरे उपन्यास में 81 पृष्ठ तक छोटी-मोटी एक-दो ही त्रुटियाॅं हैं पर 82 पृष्ठ से जो मिलना शुरू होती हैं तो मिलती ही चली जाती हैं जैसे कि
हल्का, हल्की, हल्के, मुस्कुरा, मुस्कुराती, मुस्कान, तस्वीर, बिल्कुल, मम्मी आदि शब्दों को क्रमशः
हलका, हलकी, हलके, मुसकरा, मुसकराती, मुसकान, तसवीर, बिलकुल, ममी लिखा मिलता है।
विराम चिह्न की भी त्रुटियाॅं हैं।
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11वाॅं तथा 12वाॅं भाग कुछ 'अन्तरंग' सा हो गया है पर बहुत ही सीमित, सधे, सभ्य और सांकेतिक रूप में।
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अन्तिम अर्थात् 16 वाॅं भाग पढ़ते हुए फिल्म "तारे ज़मीन पर" का नाम और दृश्य जेहन में आया।
अन्त में चरम जैसा कुछ भी नहीं है, बहुत ही सामान्य सा है, इतना कि उम्मीद नहीं थी। फिर भी मार्मिक, स्तब्ध रह जाने की हद तक।
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ये उपन्यास किसे ज़रूर पढ़ना चाहिए ----
1● जिन पति-पत्नी की सन्तान है और उनमें इतनी खटपट है कि लगता है कि
तलाक लेकर अलग हो जाना ही बेहतर रहेगा।
2● जो सन्तान-युक्त पति-पत्नी तलाक की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं।
3● वो सन्तान-युक्त पति-पत्नी तलाक ले चुके हैं और दोनों में से किसी एक के
पास एक या दोनों के पास एक-एक सन्तान है।
4● जिन दम्पती को अपनी सन्तान से सच्चे अर्थों में मोह-प्यार है।
5● दोनों या कोई एक अनैतिक सम्बन्ध में हैं, जानबूझकर बेवफ़ाई कर रहे हैं
कि कभी पता नहीं चलेगा। ऐसे सम्बन्ध का भेद खुलता ही खुलता है
चाहे दस साल बाद खुले। नतीजे में परिवार ही नहीं टूटते, हत्या की
वारदातें भी हो जाती हैं।
6● जिन्होंने घर वालों की सहमति के बिना लव मैरिज करके अलग रह रहे हैं,
ऐसे में सन्तान पैदा हो जाने के कुछ साल बाद अलगाव होने की सम्भावना
बहुत होती है।
7● जो बिना विवाह किए " लिव इन रिलेशनशिप " में रह रहे हैं।
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पुस्तक आपका बंटी
लेखिका मन्नू भंडारी
विधा उपन्यास
प्रकाशन राधाकृष्ण पेपरबैक्स
संस्करण पहला पुस्तकालय संस्करण 1971 में
पहला पेपरबैक्स संस्करण 2006 में
16 वाँ पेपरबैक्स संस्करण 2022 में
पृष्ठ 208
मूल्य 250 रुपये
[ ये समीक्षा 31 अगस्त 2022 को पोस्ट की गयी थी परन्तु अप्रूव होने से पहले ही फेसबुक ने हटा दिया था क्योंकि फेसबुक ने 30 दिन के लिए कुछ तरह के प्रतिबन्ध लगा दिये थे । इसलिए आज पुन: पोस्ट किया है।
इस अवधि में और भी कुछ पुस्तकें पढ़ीं परन्तु यह सोचकर समीक्षा लिखने के बारे में नहीं प्रयासकियाकि पोस्ट तो करने नहीं दिया जायेगा। ]
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