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| दार्शनिक मैच्योर कैसे हो जाते हैं? |
दार्शनिक मैच्योर कैसे हो जाते हैं?
आज यूं ही #विकास_दिव्यकीर्ति सर की सरस शैली और रोचक कक्षा का मैं भी साथी बन गया, सर की कथन शैली ऐसे जैसे किताब से शब्दों को देखकर पढ़ा जा रहा हो,
खैर आज मेरा दार्शनिक दृष्टिकोण से परिचय कराया गया मेरे ख्याल से दिव्यकीर्ति सर का दार्शनिकों पर काफी हद तक अध्ययन रहा होगा, जिसके फलत: वे अपनी बातें बिना हिचकिचाये साथियों के बीच बुदबुदा लेते हैं।
उनकी भाषा शैली का सिर्फ मैं ही नहीं अपितु लाखों लोग दीवाने हैं लेकिन उनकी कहीं बातें सभी पचा लें आसान नहीं होता। जैसा कि उन्होंने कहा था कि जो दार्शनिक होता है, वह उम्र के पहले ही मैच्योर हो जाता है।
मैच्योर क्या होता है?
मैच्योर का मतलब समझदार जिसका प्रभाव ना सिर्फ उसकी विचार धारा पर पड़ता है बल्कि वो इंसान अपनी जीवन शैली में भी अंतर देख पाता है।
फिर उसे यूं सड़क पर गाना गाते हुए सीटी बजाते हुए निकलना उसे अपने आप में फीका लगेगा, भले ही उसकी उम्र के लोग ये कर रहे हों उसका दृष्टि कोण एक संत जैसा या कुछ कुछ गंभीर होने की कोशिश करने लगता है, क्योंकि अब वो अनुभवों के पिटारे में प्रवेश कर गया है, किसी से गाली सुनने पर अब वो चार गुना बापिस देना पसंद नही करेगा बल्कि मन ही मन हंसेगा, और विचारेगा, नादान है समझ जायेगा इत्यादि....
इसके पीछे का अगर कारण देखें तो क्या हो सकता है ? इंसान ऐसे कैसे परिवर्तित हो सकता है? इसका सीधा सा जवाब है अनुभव से, और अनुभव भी उसका जिसका जीवन उस एक बात को समझने में खर्च हो गया, और फिर जाकर उसे अंत में वह बात समझ आई लेकिन इस पाठक को वही बात इसी उम्र में कुछ ही पलों में समझ आ गई, इसलिए इसे वो सब कुछ नही करना पड़ा जो किसी एक फिलोश्फर को समय की मार या उम्र को खर्च करते हुऐ करना पड़ा, इसे जो समझदारी उम्र के एक पड़ाव पर आनी थी, वो उसने दार्शनिकों के अनुभव से अभी आ गई। इसलिए वह व्यक्ति कभी कभी अपनी उम्र के लोगों से कुछ अलग ही चमकने लगता है, तो कभी कभी उदासीन भी हो जाता है, क्योंकि अब उसे सत्यार्थ का ज्ञान है क्योंकि वह दार्शनिकों से पूर्व में ही अनुभव ले चुका है। इसलिए उसकी विचारधारा में मैच्योर पना आ जाता है।
अब वह समझदारी की किताब के पन्ने पलट आने को मात्र तैयार नहीं है बल्कि कुछ पन्ने उसके द्वारा पढ़े जा चुके हैं।
कहते हैं कि
अनुभव साथी आपनो, तुझको ज्ञान सुहाय।
ज्ञान प्लस अनुभव भयो तब तगड़ो भी हिल जाए।।
खैर ये श्लोक मेरी लेखनी का व्यंग मिश्रित अनुभव ही है परंतु रहीमदास जी का भी कुछ ऐसा ही कहना था।
रहिमन बात अगम्य की,
कहन सुनन की नाहीं।
जो जानत सो कहत नहीं,
कहत सो जानत नाहीं।।

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